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मांसाहार करके छोड़ने वाले व्यक्ति को समाज के माँसाहारी ‘नौ सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली’ कहावत सुना सकते हैं. जबकि मांसाहार छोड़ने वाला व्यक्ति ऐसा करके सचमुच में इस प्रकार कई बड़े ही नेक काम करता है. जिनमे मांसाहार के लिए काटने वाले प्राणी की जान को बचाना और धरती पर चारे की अधिक पैदावार बढाने का दबाव कम करना दोनों ही शामिल हैं. मेरी इस दलील को मांसाहारप्रेमी यह कह कर खारिज कर सकते हैं. कि हमारे मांस खाना छोड़ने से किसी प्राणी की जान कैसे बच सकती है, किन्तु यदि किसी प्रेरणा से एक लाख व्यक्ति मांस खाना छोड़ दे तो आप स्वयं गणना कर सकते हैं कि इस प्रकार कितने मुर्गों, बकरों और बाक़ी प्राणियों के प्राण बचेंगे, अवैध शिकारियों के हाथों मरने वाले अलग. यदि एक व्यक्ति ढाई सौ ग्राम मुर्गा खाता हैं तो इस प्रकार लगभग पच्चीस हज़ार मुर्गों की जान बच सकती है, जिस निरीह प्राणी को केवल जीभ के स्वाद की पूर्ति हेतु काटने के लिए पौल्ट्री फार्म में पैदा किया जाता हैं. इसी प्रकार यदि एक बकरे से तीस किलो मीट प्राप्त होता है और उसे एक सौ बीस व्यक्ति मांसाहार के रूप में प्रयोग कर सकते है तो समझिये कि एक लाख लोगो कि मांसाहार छोड़ने से एक बार में करीब आठ सौ तैंतीस बकरों की जाने बख्श जाती.

इसके अलावा तीस किलो के एक बकरे को पालने और बड़ा करने में वह अपने वजन से कई गुना चारा खा जाता है. इस चारे के स्थान पर मनुष्य के लिए अन्न पैदा किया जा सकता है. एक बकरा अपने दो वर्ष के जीवनकाल में लगभग डेढ़ हज़ार लीटर पानी पी जाता है (यदि वह केवल दो लीटर पानी प्रतिदिन पीता है). जबकि भैसों के लिए यह मात्रा लगभग एक लाख लीटर से अधिक भी हो सकती है. यह पानी कितने प्यासे मनुष्यों के काम आ सकता है. क्या प्राकृतिक संसाधनों की ऐसी बर्बादी हमारे लिए उचित हैं, जबकि वैज्ञानिक तीसरे विश्वयुद्ध के पानी के विषय पर होने की चेतावनी दे चुके हैं.

कृपया कबीरदास जी के इस दोहे पर गौर फ़रमाईये—

”बकरी पाती खात है, ताकि काढी खाल, जो नर बकरी खात हैं, वाको को कौन हवाल”

सोचिये ! और निर्णय लीजिये.

मांसाहार छोडिये और शाकाहार की ओर चलिए………..

आप दुसरे प्राणी की बात करते हो पेहले तो आदमी मानव प्राणी को ही खा जाया करता था । शुकर मनाओ के आज वो प्रथा नही है । आज सिर्फ शाकाहार पर जीनेवाले कितने है ? कुछ मारवाडी, कुछ गुजराती और
कुछ जीवदया वाले । ये लोग प्रुथ्वी की आबादी का ५ टका भी नही है । ९५ टका लोग जीवदया वाले नही है और उनका धर्म भी उन को मासाहार के लिये मना नही करता । खुराक के लिये वो पूरी तरह निर्भर है जीवस्रुष्टी पर, दरियाई या जमीनी ।

कुदरत ने शार्क को बडा मुह और मजबूत दान्त दिये है दुसरे दरियाई जिवो को निगलने और चाबाने । शेर को भी मजबूत दान्त और नाखुन दिये है शिकार को चिरने और फाडने । डर गये ? जीवदया डरनेवालो की विचारधारा है । खुराक को अगर जीवदया या धर्म के साथ जोडा जाये तो ये धर्म मे दखल हो जाती है । आज दुनिया मे ४ हजार से ज्यादा धर्म है । धर्म के लिस्ट मे आदमी को अपना धर्म ढुन्ढना हो तो ५ मिनिट लगती है, कहा पर है हमारा धर्म । आज कीसी के पास कोई दावा नही बचा है की वो केह दे की हमारा धर्म श्रेष्ठ है । खुराक को खुराक मान के चलो तो भी एक दुसरे के खान पान मे दखल होता है । ईकोनोमी के साथ भी खिलवाड हो जाता है । अगर पूरी दुनिया अनाज खाने लगे तो किसी के मुह मे कुछ नही आयेगा, १० का माल १००० हो जायेगा । एक केले की किमत १००० रुपया चुकाने को आप तैयार हो ? वनस्पतीस्रुष्टि मे ईतनी क्षमता भी नही की सबका पेट भर सके । और जीवदया वाले वनस्पति औए प्राणी मे भेदभाव क्यो करते है, जीव तो दोनो मे है ।

जीवदया धार्मिक आदर्शवाद के सिवा कुछ नही । जब जमीनी हकिकत सामने आती है तो सारे आदर्श्वाद हवा हो जाते है । मै और मेरा समाज शाकाहारी है । कोइ मासाहार कर ले तो उसकी कोइ ईज्जत नही रेहती । लेकिन मै स्वार्थी बन गया हु अपने समाज के लिये । मै चाहता हु मेरे समाज के लोग मासाहार ना करे । बाकी के लोग जाये भाड मे , मेरे समाज के लोगो को अनाज मिलता रेहना चाहिये । मेरे समाज को अनाज का आज का भाव भी बहुत भारी पड रहा है । अगर ईसमे बढोतरी हो गई तो हम तो भुख से ही मर जायेन्गे । जीवदया या जीवदया वाले हमे नही बचायेन्गे । आप पानी के लिये विश्वयुध्ध को ले आये । युध्ध पानी से नही होन्गे, विचारो के टकराव से होन्गे ।

पानी की बरबादी बकरी या भेन्स के पीने से नही होती आदमी ही बरबाद करता है । आदमी ने खूद को ईतना गन्दा समज लिया है की भेन्स के गोबरसे भी अपना गोबर ज्यादा गन्दा लगता है । साफ करने के लिये ५-५ बालटी पानी बहा देता है । आदमी को अपनी खाल ईतनी गन्दी लगती है साबुन के साथ कितना पानी बहा देता है । और अनाज उगाने दरिया का पानी नही चलता, पेयजल ही चाहिए। पानी की ये जमीनी हकिकत है उसमे बदलाव का सुजाव या उसका केल्कुलेशन एक मूर्ख ही करेगा ।

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