
शाकाहार के संबंध में जब भी हम बात करते हैं, तो इसके अलग-अलग अर्थ लिए जाते हैं। कुछ लोग दूध और दूध से बनी चीजों को शाकाहार में शामिल नहीं करते, तो कुछ लोग मछली को शाकाहार मानते हैं। भारत में दुनिया भर में सबसे अधिक यानी 48 प्रतिशत से अधिक लोग शाकाहारी हैं, उसके बाद ब्रिटेन में 12 प्रतिशत, इजरायल में 13 प्रतिशत, स्वीडन में 10 प्रतिशत और चेक गणराज्य व पुर्तगाल में 1.5 प्रतिशत से भी कम शाकाहारी हैं।
अफ्रीकी देशों में शाकाहार बहुत ही कम और कहीं-कहीं तो उनकी संस्कृति में है ही नहीं। रूस ऐसा देश है, जहां शाकाहार की बात लोगों की समझ में नहीं आती। इटली में इन दिनों जरूर शाकाहार का प्रचलन बढ़ रहा है। यूरोपियन वेजीटेरियन यूनियन के अनुसार, इटली में इस समय 60 लाख से अधिक यानी तकरीबन आठ प्रतिशत लोग शाकाहारी हैं।
इसी इटली का एक शहर है तुरिन, जो अपनी मांसाहारी पाक कला के लिए प्रसिद्ध है। अब वहां की नई मेयर 32 वर्षीया चियारा एपेंडीनो ने एक पंचवर्षीय योजना तैयार की है, जिसके तहत वह पूरे शहर में शाकाहार को बढ़ावा देने जा रही हैं। उनका कहना है कि लोगों के स्वास्थ्य व पशुधन के साथ पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है कि अधिक से अधिक लोग शाकाहार अपनाएं। तुरिन की नगरपालिका द्वारा अब स्कूलों में बच्चों को मांसाहार से पर्यावरण को होने वाले नुकसान और पानी के अनावश्यक उपयोग यानी अपव्यय से होने वाली हानि से परिचित कराया जाएगा।
हालांकि तुरिन के लोगों को उनकी शाकाहार वाली बात पच नहीं रही है। इस प्रस्ताव का मजाक भी उड़ाया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि शहर में मांसाहार या उससे जुड़े उद्योग पर कोई पाबंदी लगाई जा रही है, बस इसके खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। लोग इसी को लेकर गुस्से में हैं। जबकि दूसरी तरफ मेयर एपेंडीनो तुरिन को इटली का या शायद दुनिया का पहला ‘शाकाहारी शहर’ बनाना चाहती हैं।
अब यह माना जाने लगा है कि अधिक मांसाहार और ग्लोबल वार्मिंग में सीधा रिश्ता है। साथ ही कहा जाता है कि मांसाहार से मोटापा तो बढ़ता ही है, मधुमेह की समस्या भी होती है। इसीलिए चीन के स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी लोगों को मांसाहार कम करने की सलाह दी है। इस संबंध में जो दिशा-निर्देश दिए गए हैं, उसमें कहा गया है कि मांसाहार कम करने से आगामी वर्षों में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन एक अरब टन कम हो जाएगा।
कहा जाता है कि चीन में किसी समय संपन्न लोग ही मांस खा पाते थे और केवल बड़े लोगों की पार्टियों में ही वह परोसा जाता था, पर अब मांसाहार बहुत से चीनियों का मुख्य आहार है। इसीलिए माना जा रहा है कि चीन में मांसाहार कम करने की यह चुनौती बहुत कठिन है। इटली से भी कहीं ज्यादा कठिन। इन देशों में जिस पैमाने पर प्रयास हो रहे हैं, उस पैमाने पर प्रयास भारत में नहीं हो रहे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)





