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तकरीबन तीन साल पहले मैं इटली के एक छोटे-से गांव डैम्हनर में रुकी थी। वहां के लोग एक स्थानीय गुरु फैल्को के अनुयायी हैं। वह जगह और वहां के लोग, दोनों काफी लुभावने हैं। वे अपना घर खुद बनाते हैं। खाने-पीने वाली चीजों का उत्पादन भी स्वयं करते हैं। और तो और, पनीर और शराब जैसी चीजें भी खुद ही बनाते हैं। इन सबके लिए वे लोग अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी जीत चुके हैं। कुल मिलाकर वे लोग अपनी नैतिकता और रचनात्मक क्षमता का इस्तेमाल कर दुनिया को उतना ही खूबसूरत बनाना चाहते हैं, जितना कि उसे होना चाहिए। इन सब सामान्य कामकाज के अलावा वहां के लोग इस समय दो विशेष परियोजनाओं को मूर्त रूप देने में जुटे हैं।

इन लोगों ने एक ऐसी मशीन तैयार की है, जो पौधों की आवाज सुनने में मददगार है। उन्होंने इसका पेटेंट भी करवा लिया है। उस मशीन को पत्तियों के साथ जोड़ देने के बाद मैंने खुद भी पौधों के बोलने या गाने की आवाजों का एहसास किया है। उनकी दूसरी परियोजना है मांस की कोशिकाओं का प्रतिरूप तैयार करना, ताकि जानवरों की हत्या किए बिना ही मांसाहार का स्वाद लिया जा सके। इस दिशा में मैंने उनके कुछ काम देखे हैं, लेकिन अभी उन लोगों को लंबा रास्ता तय करना है।

खान-पान की दुनिया में बड़े बदलाव को मूर्त रूप देने के लिए इसी साल वाशिंगटन में कुछ लोग इकट्ठा होने जा रहे हैं। ये साथ बैठकर भोजन करेंगे, जिसमें सिर्फ भुना हुआ मुर्गा होगा। देखने में और स्वाद में भी फ्राइड चिकन जैसा वह उत्पाद दरअसल चिकन का प्रतिरूप होगा।

पशुओं के कल्याण से जुड़ी अमेरिकी संस्था पेटा ने पांच साल पहले दुनिया भर के वैज्ञानिकों को एक चुनौती दी थी। उन्हें 30 जून, 2012 तक साबित करना था कि वे वाणिज्यिक उपयोग लायक मात्रा में कृत्रिम मांस तैयार कर सकते हैं। पेटा ने ऐसा करने वाले पहले वैज्ञानिक को दस लाख डॉलर देने की भी घोषणा की थी। इस चुनौती को कई वैज्ञानिकों और संस्थाओं ने स्वीकार किया है। डैम्हनर भी उनमें से एक है।

नीदरलैंड के मासट्रिक्ट विश्वविद्यालय के वैस्कुलर फिजियोलॉजी विभाग के प्रमुख मार्क पोस्ट ने भी यह चुनौती स्वीकार की है। वहां की सरकार और एक स्वायत्त दानदाता ने पोस्ट को उनके स्टेम सेल अनुसंधान के लिए तीन लाख डॉलर दिए हैं। पोस्ट ने इस साल एक सिंथेटिक बीफ बर्गर तैयार करने का दावा किया है। लेकिन वह पेटा का इनाम नहीं जीत सकते, क्योंकि उन्होंने बीफ बर्गर पर काम किया है, चिकन पर नहीं। वैसे उन्होंने कुछ सेंटीमीटर लंबी मांस की एक पट्टी विकसित करने में सफलता हासिल की है।

इसके अलावा अमेरिका में रह रहे एक रूसी वैज्ञानिक ब्लादिमीर मिरनोव ब्राजील में मांस उत्पादन करने वाली एक कंपनी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। उन्होंने टर्की से भ्रूण की मांसपेशीय कोशिकाएं लेकर मांसपेशीय ऊतक विकसित करने में सफलता हासिल की है। लेकिन मात्रात्मक लिहाज से वह बहुत कम है। वहीं, नीदरलैंड की यूट्रेक्ट विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का एक दूसरा समूह भी भ्रूण से तैयार स्टेम कोशिकाओं पर प्रयोग कर रहा है। कहा यह जा रहा है कि एक स्टेम कोशिका से हजारों किलोग्राम मांस तैयार किया जा सकता है। हालांकि यह अनुसंधान जटिल है और कठिन भी। वैज्ञानिक इसके लिए अभी और धन व समय की मांग कर रहे हैं। अंतिम नतीजे आने में अभी एक दशक लग सकता है। लेकिन वैज्ञानिक समुदाय ऊतक से कृत्रिम मांस तैयार करने को लेकर आश्वस्त है।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन के अनुमानों की मानें, तो 2050 तक दुनिया में मांस का उपभोग दोगुना हो जाएगा। जमीन और पानी की लगातार कमी के चलते यह एक बड़ी चुनौती साबित होगा। चीन और भारत जैसे देशों में तो मांस का उपभोग लगातार बढ़ रहा है। इस लिहाज से देखें, तो भविष्य में पृथ्वी का अस्तित्व बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि हम मांस के प्रभावी विकल्प को खोजने में कितना और कब सफल हो पाते हैं। अगर मांस का विकल्प नहीं खोजा गया, तो पशुओं के प्रति क्रूरता, संसाधनों की कमी और बर्ड फ्लू जैसी बीमारियों का बढ़ना तकरीबन तय है। पिछले साल ऑक्सफोर्ड और एम्सटर्डम विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग के जरिये दुनिया को दिखाया था कि कृत्रिम मांस तैयार करने पर मांस की तुलना में केवल एक फीसदी जमीन और चार फीसदी जल की जरूरत होती है।

मांसाहार का विकल्प कोई नई बात नहीं है। राजस्थान में मैंने एक ऐसे व्यंजन का लुफ्त उठाया है, जो बनता तो गेहूं से है, लेकिन उसका स्वाद बिलकुल मांस जैसा होता है। बताया जाता है कि अपने पतियों को शाकाहार की तरफ मोड़ने के लिए राजस्थान की महिलाओं ने तकरीबन 200 साल पहले इस व्यंजन की खोज की थी। अगर कृत्रिम मांस की खोज सफल हो जाती है, तो निश्चित रूप से यह नोबल की हकदार होगी, क्योंकि बिजली के बाद शायद यह सबसे अहम खोज होगी। इससे जमीन और जल जैसे संसाधनों की बचत होगी। इससे वनों को दोबारा पनपने और पृथ्वी के ठंडा रहने में मदद मिलेगी। इससे हमें कीटनाशकों और एंटीबायोटिक से मुक्ति मिलेगी, जो फसलों और पशुओं के जरिये हमारे शरीर में पहुंचती है। वैसे अगर यह खोज किसी भारतीय वैज्ञानिक ने की, तो मैं उसे एक करोड़ रुपये दूंगी।

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