
डॉ अनेकांत कुमार जैन
मुस्लिम समाज में कुर्बानी और मांसाहार आम बात है,किन्तु ऐसे अनेक उदाहरण भी देखने में आये हैं जहाँ इस्लाम के द्वारा ही इसका निषेध किया गया है। इसका सर्वोत्कृष्ट आदर्शयुक्त उदाहरण हज की यात्रा है। मैंने इसका वर्णन साक्षात् सुना है तथा कई स्थानों पर पढ़ा है कि जब कोई व्यक्ति हज करने जाता है तो इहराम (सिर पर बाँधने का सफेद कपड़ा) बाँध कर जाता है। इहराम की स्थिति में वह न तो पशु-पक्षी को मार सकता है न किसी जीवधारी पर ढेला फेक सकता है और न घास नोंच सकता है। यहाँ तक कि वह किसी हरे-भरे वृक्ष की टहनी पत्ती तक भी नहीं तोड़ सकता। इस प्रकार हज करते समय अहिंसा के पूर्ण पालन का स्पष्टविधान है,कुरआन में लिखा है - ‘इहराम की हालत में शिकार करना मना है’।
इतना ही नहीं, इस्लाम के पवित्र तीर्थ मक्का स्थित कस्बे के चारों ओर कई मीलों के घेरे में किसी भी पशुपक्षी की हत्या करने का निषेध है। हज-काल में हज करने वालों को मद्य-मांस का भी सर्वथा त्याग जरूरी है। इस्लाम में आध्यात्मिक साधना में मांसाहार पूरी तरह वर्जित है, जिसे तकें हैवानात (जानवर से प्राप्त वस्तु का त्याग) कहते हैं।
डॉ. कामता प्रसाद लिखते हैं ‘मजरदस्त ने ईरान में पशुबलि का विरोध कर अहिंसा की प्राणप्रतिष्ठा की थीं ईरान के शाहदरा के पाषाणों पर अहिंसा का आदेश अंकित कराया था। तेजमशेद नामक स्थान पर एक लेख आज भी मौजूद हैं।
आज भारत में भी ऐसे अनेक उदहारण हैं। कर्नाटक राज्य में गुलबर्गा में अल्लन्द जाने के मार्ग में चौदहवीं शताब्दी में मशहूर दरवेश वाजा वन्दानवाज गौसूदराज के समकालीन दरवेश हजरत शारुव्रुद्दीन की मजार के आगे लिखा है- ‘‘यदि तुमने मांस खाया है तो मेहरबानी कर अन्दर मत आओ’’
इसके अलावा कई मुस्लिमसम्राटों ने जैनों के दशलक्षण-पर्युषण पर्व पर कत्लखानों तथा मांस की दुकानों को बन्द रखने के आदेश भी दिये हैं। जिसके प्रमाण मौजूद हैं।
इस्लाम दर्शन में ग्यारहवीं शती में एक प्रख्यात चिंतक हुए ‘अबुल अरा’ (सन् १०५७) अबुल अरा आवागमन के सिद्धान्त के विश्वासी थे। शाकाहारी तो थे ही, दूध, मधु और चमड़े का व्यवहार भी नहीं करते थे। पशु-पक्षियों के लिए उनके मन में दया थी। वे ब्रह्मचर्य और यतिवृत्ति का भी पालन करते थे।
मुहम्मद साहब के उत्तराधिकारी हजरत अली ने मानवों को संबोधित करते हुए कहा - हे मानव! तू पशु -पक्षियों की कब्र अपने पेट में मत बना।’’ अर्थात् तू माँस का भक्षण मत कर। इसी प्रकार ‘ दीन-ए-एलाही’ विचारधारा के प्रवर्तक सम्राट अकबर ने कहा- मैं अपने पेट को दूसरे जीवों का कब्रिस्तान नहीं बनाना चाहता।’’ यदि किसी की जान बचाई तो मानों उसने सारे इन्सानों की जिन्दगी बख्शी है। कुरान शरीफ का वाक्य है - व मन् अह्या हा फकअन्नम् अह्यन्नास जमी अनः’।
इस्लाम की मान्यता है कि जगत मे जितने भी प्राणी हैं, वे सभी खुदा के ही बन्दे और पुत्र हैं। कुरान शरीफ के प्रारंभ में अल्लाताला का विशेषण ‘विस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीमि’ है, जिसका अर्थ है, खुदा दयामय है अर्थात् खुदा के मन के कोने-कोने में दया का निवास है।
सा. गोडवाड ज्योति





